हिंदी कहानी · स्कूल रोमांस

शिकायत पेटी

हर स्कूल में एक शिकायत पेटी होती है, जिसे कोई नहीं खोलता। सरस्वती विद्या मंदिर की पेटी पंद्रह साल बाद खुली — रीयूनियन के दिन, सबके सामने। ग़लती से।

रीयूनियन का बैनर टेढ़ा टंगा था — "स्वागत है, बैच 2011"। मैदान वही था, बस छोटा लग रहा था। बरगद वही था, बस बड़ा। और स्टाफ़ रूम के बाहर दीवार पर वही जंग लगी हरी शिकायत पेटी टंगी थी, जिसका ताला स्कूल के इतिहास में कभी खुलते किसी ने नहीं देखा था।

"यह अब भी यहीं है?" समीर ने हंसते हुए कहा, और यह कहते हुए उसकी आवाज़ ज़रा सी लड़खड़ाई। पंद्रह साल बाद भी।

क्योंकि उस पेटी के अंदर उसकी नौ चिट्ठियां थीं।

क्लास नौ से बारहवीं तक, हर साल दो-तीन बार, समीर ने उस पेटी में चिट्ठी डाली थी। शिकायत नहीं — चिट्ठी। उस ज़माने में जब फ़ोन घर में एक होता था और हिम्मत सीने में बिल्कुल नहीं, समीर ने दुनिया की सबसे सुरक्षित डाक सेवा ढूंढ निकाली थी: वह डिब्बा, जो कभी खुलता ही नहीं था।

जो बात कहनी ज़रूरी हो, पर जिसका पहुंचना ज़रूरी न हो — उसके लिए बंद पेटी से अच्छी जगह कोई नहीं।

चिट्ठियां किसके नाम थीं, यह समीर के अलावा सिर्फ एक इंसान जानता था। वह भी आज मैदान में खड़ी थी — नेहा। बैच की सबसे तेज़ लड़की, जो अब इसी स्कूल में हिंदी पढ़ाती थी।

ताला

गड़बड़ प्रिंसिपल साहब से हुई। नए वाले, जोशी सर — जिन्हें पुरानी चीज़ें फेंकने का शौक़ था। रीयूनियन के भाषण में उन्होंने घोषणा कर दी:

"यह पेटी अगले हफ़्ते हट रही है। डिजिटल ज़माना है, अब शिकायतें ऐप पर आएंगी। चलिए, आज पुराने बैच के सामने ही इसे खोलकर देखते हैं — पंद्रह-बीस साल की शिकायतों का संग्रहालय निकलेगा!"

चाबी कब की खो चुकी थी। चौकीदार हथौड़ी लाया। समीर ने पानी की बोतल उठाई और सोचा कि अभी, इसी वक़्त, यहां से निकल जाना कितना मुश्किल होगा।

उसने नेहा की तरफ़ देखा। नेहा पहले से उसी की तरफ़ देख रही थी।

ताला टूटा। पेटी खुली। अंदर से निकलीं — गिनकर — बाईस चिट्ठियां।

समीर का गणित एक सेकंड में फेल हो गया। बाईस? उसने तो नौ डाली थीं।

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बाईस चिट्ठियां

जोशी सर ने पहली चिट्ठी खोली। पीला पड़ चुका काग़ज़, स्कूल की कॉपी से फटा हुआ पन्ना।

"मुझे शिकायत है कि तुमने आज सुबह प्रार्थना में दो चोटी की जगह एक चोटी बनाई, और मैं पूरी प्रार्थना भूल गया। — पानी की बोतल भूलने वाला"

मैदान में हंसी का फव्वारा छूटा। समीर ज़मीन में गड़ गया। कोई नाम नहीं था, पर उसे लगा जैसे बैनर पर उसकी फ़ोटो टंग गई हो।

दूसरी चिट्ठी। तीसरी। पांचवीं। हंसी हर बार, तालियां भी। नौ चिट्ठियों में एक लड़के के चार साल थे — दो चोटी वाली एक लड़की, गणित के पीरियड की एक खिड़की, और वह बात, जो कभी नहीं कही गई।

फिर दसवीं चिट्ठी निकली। अलग काग़ज़। गोल, साफ़ लिखावट।

"मुझे शिकायत है कि जिसे चिट्ठी लिखना आता है, उसे देखकर बात करना नहीं आता। — दो चोटी वाली"

मैदान चुप।

ग्यारहवीं चिट्ठी, वही लिखावट: "मुझे शिकायत है कि आज उसने पूरे दिन मेरी तरफ़ नहीं देखा। कल की चिट्ठी वापस लेती हूं। नहीं, नहीं लेती।"

बारहवीं। तेरहवीं। बाईसवीं तक — तेरह चिट्ठियां उस गोल लिखावट में थीं। आख़िरी वाली बारहवीं क्लास के फेयरवेल के दिन की तारीख़ पर ख़त्म होती थी: "मुझे शिकायत है कि कल यह स्कूल ख़त्म हो जाएगा, और डाकिये ने एक भी चिट्ठी नहीं पहुंचाई। मैं इंतज़ार करूंगी। जिस दिन यह पेटी खुलेगी, उस दिन का।"

डाकिया

जोशी सर ने गला खंखारा और कहा कि चलिए, समोसे ठंडे हो रहे हैं। भीड़ समोसों की तरफ़ बढ़ गई, क्योंकि भीड़ को समझ आ गया था कि आगे का हिस्सा भीड़ के लिए नहीं है।

बरगद के नीचे समीर और नेहा रह गए। पंद्रह साल, नौ और तेरह चिट्ठियां — बीच में।

"तुम्हें पता था?" समीर ने पूछा। "कि मेरी हैं?"

"क्लास नौ की तीसरी चिट्ठी से," नेहा ने कहा। "तुमने उसमें लिखा था कि गणित के पीरियड में खिड़की से बरगद दिखता है। वह खिड़की की सीट पूरी क्लास में सिर्फ एक लड़के की थी, जो रोज़ पानी की बोतल भूलता था।"

"तो तुमने जवाब उसी पेटी में क्यों डाले? मुझे कभी मिलते ही नहीं।"

"तुमने भी तो वहीं डाले थे," नेहा ने कहा। "हम दोनों को पहुंचाना नहीं आता था, समीर। लिखना आता था। इसीलिए मैं यहीं की टीचर बनी। मुझे पता था — सरकारी चीज़ें देर से खुलती हैं, पर खुलती ज़रूर हैं।"

समीर हंसा। फिर उसने वह किया, जो सोलह साल की उम्र में करना चाहिए था — जेब से रीयूनियन का निमंत्रण-कार्ड निकाला, उसके पीछे कुछ लिखा, मोड़ा, और नेहा के हाथ में रख दिया।

"यह वाली डाक हाथों-हाथ है," उसने कहा। "पंद्रह साल का बैकलॉग है। पढ़कर बताना — शिकायत मंज़ूर है या नहीं।"

नेहा ने काग़ज़ खोला। उसमें लिखा था — "मुझे शिकायत है कि यह कहानी शादी के कार्ड तक क्यों नहीं पहुंची अब तक। — पानी की बोतल वाला, जो अब बोतल नहीं भूलता, पर तुम्हें नहीं भूला"

नेहा ने काग़ज़ मोड़कर पर्स में रखा। "शिकायत," उसने कहा, "प्रक्रिया में है।"

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