रोल नंबर 46
पूरा कॉलेज परीक्षा से डरता था। सिर्फ एक लड़का था, जो दिसंबर और मई का इंतज़ार करता था — क्योंकि सीटिंग प्लान रोल नंबर से लगता था।
बी.कॉम. फर्स्ट ईयर की पहली परीक्षा के दिन आदित्य ने जाना कि क़िस्मत नाम की चीज़ रोल नंबर में रहती है।
उसका रोल नंबर था 47। और ठीक उसकी बगल वाली सीट पर, हॉल के तीसरे कमरे की चौथी लाइन में, बैठी थी रोल नंबर 46 — सान्वी। सेक्शन B वाली सान्वी, जिससे पूरे सेमेस्टर में बात करने का कोई बहाना नहीं मिला था, क्योंकि सेक्शन A और B की क्लासें अलग, कैंटीन की टाइमिंग अलग, दुनिया अलग।
पर परीक्षा हॉल में सेक्शन नहीं होते। वहां सिर्फ रोल नंबर होते हैं।
पेपर शुरू होने से पहले के दस मिनट — जब इनविजिलेटर शीट गिन रहे होते हैं और दिल धड़क रहे होते हैं — उन दस मिनटों में आदित्य और सान्वी की पहली बातचीत हुई। बातचीत क्या थी, सान्वी ने पूछा था, "एक्स्ट्रा पेन है?"
आदित्य के पास एक्स्ट्रा पेन था। हमेशा रहता था। उस दिन के बाद हमेशा दो रहने लगे।
साल में बीस मिनट
यह उनकी पूरी प्रेम कहानी का गणित था: हर सेमेस्टर एक परीक्षा-सीज़न, हर सीज़न में पेपर से पहले के दस-दस मिनट। जोड़ो तो साल में मुश्किल से बीस-पच्चीस मिनट।
उन्हीं मिनटों में आदित्य को पता चला कि सान्वी को अकाउंट्स से नफ़रत है और कविता से प्यार। कि उसके पापा की साड़ी की दुकान है और सपना सिविल सर्विसेज़ का। सान्वी को पता चला कि आदित्य क्रिकेट में लेफ्ट-हैंडेड है और ज़िंदगी में राइट। कि वह मज़ाक़ सीधे मुंह करता है, इसलिए आधे लोग समझ नहीं पाते।
सेकंड ईयर की परीक्षा में सान्वी ने कहा था — "तुमसे बात करके पेपर का डर उतर जाता है।" आदित्य ने जवाब दिया था — "मेरा चढ़ जाता है। पर दूसरा वाला।"
सान्वी हंस दी थी। इनविजिलेटर ने घूरा था। और आदित्य ने उस पेपर में दो सवाल इसलिए छोड़ दिए थे, क्योंकि हॉल में किसी की हंसी गूंज रही थी।
न नंबर मांगा गया, न दिया गया। यह उस ज़माने के दो शर्मीले लोगों का रिवाज़ था — अगली परीक्षा तो आएगी ही। रोल नंबर कहां भागे जा रहे हैं।
खाली सीट
फाइनल ईयर की आख़िरी परीक्षा। आख़िरी पेपर। आदित्य सुबह साढ़े सात बजे हॉल पहुंच गया — डेढ़ घंटा पहले। आज दस मिनट से काम नहीं चलना था। आज उसने तय किया था कि पेपर के बाद रोकेगा। नंबर मांगेगा। पूरा वाक्य बोलेगा, बिना मज़ाक़ के।
नौ बजे। सीटें भरने लगीं। रोल नंबर 45 आया। 48 आया। 46 की सीट खाली रही।
पेपर बंटा। खाली रही।
तीन घंटे का पेपर आदित्य ने एक खाली कुर्सी की बगल में बैठकर लिखा। क्या लिखा, उसे आज तक नहीं पता।
बाद में किसी ने बताया — सान्वी के पापा की तबियत अचानक बिगड़ी थी, पूरा परिवार रातों-रात गांव गया। पेपर छूट गया। सप्लीमेंट्री में देगी।
पर सप्लीमेंट्री परीक्षा में सीटिंग प्लान अलग होता है। और कॉलेज ख़त्म हो चुका था। आदित्य के हाथ में डिग्री थी, और तीन साल की कहानी का कोई आख़िरी पन्ना नहीं था।
आख़िरी सवाल
छह महीने बाद कॉन्वोकेशन हुआ। काले गाउन, टोपियां, कैमरे। आदित्य स्टेज से डिग्री लेकर उतरा ही था कि पीछे से आवाज़ आई —
"एक्स्ट्रा पेन है?"
वह पलटा। सान्वी। गाउन में, हाथ में डिग्री, आंखों में वही परीक्षा से पहले वाली घबराहट।
"पापा अब ठीक हैं," उसने कहा। "सप्लीमेंट्री क्लियर हो गई। पता है सप्लीमेंट्री हॉल में मैं कहां बैठी थी? रोल नंबर से नहीं लगता वहां सीटिंग प्लान। जहां मर्ज़ी बैठो। मैं फिर भी चौथी लाइन में गई थी। बगल वाली सीट खाली थी। बहुत बुरा लगता है, पता है, जब बगल वाली सीट खाली हो।"
आदित्य ने जेब से पेन निकाला। वही, हमेशा वाला एक्स्ट्रा। तीन साल में पहली बार उसके हाथ नहीं कांप रहे थे।
"पेन नहीं दूंगा," उसने कहा। "नंबर लिखने के लिए अपना फ़ोन दूंगा। और एक सवाल भी है — तीन घंटे वाला नहीं, पूरी ज़िंदगी वाला। सोचकर जवाब देना। टाइम की कमी नहीं है अब।"
सान्वी ने फ़ोन लिया। नंबर टाइप किया। नाम की जगह लिखा — रोल नंबर 46।
"जवाब वहीं सेव है," उसने कहा, और अपने घरवालों की तरफ़ भाग गई।
आदित्य ने कॉन्टैक्ट खोला। नंबर के नीचे, नोट वाले खाने में, लिखा था — "हां। और अगली बार दो सवाल मत छोड़ना, टॉपर।"
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