हिंदी कहानी · भावनात्मक प्रेम

आख़िरी चिट्ठी

एक छोटी सी प्रेम कहानी — पढ़ने में आठ मिनट, भूलने में बहुत ज़्यादा।

मीरा को गिनती आती थी। यही उसका काम था — गांव के स्कूल में बच्चों को गिनती सिखाना। लेकिन पिछले तीन महीनों से वह सिर्फ एक चीज़ गिनती थी: चिट्ठियां।

कबीर हर हफ्ते लिखता था। सरहद पर तैनात आदमी के पास वक्त कम होता है और कहने को बहुत कुछ — इसलिए उसकी चिट्ठियां छोटी होती थीं और बातें लंबी। "यहां रातें इतनी ठंडी हैं कि तुम्हारे हाथ की चाय याद आती है। और चाय के बहाने तुम्हारे हाथ।" मीरा जवाब में हमेशा एक ही बात लिखती — "जल्दी आओ। चाय ठंडी हो रही है।"

ग्यारह चिट्ठियां आईं। बारहवीं नहीं आई।

बारहवें हफ्ते जो आया, वह डाकिया नहीं था। खाकी वर्दी में दो लोग थे, और उनके हाथ में एक तिरंगे में लिपटी हुई ख़ामोशी। गांव ने कबीर को पूरे सम्मान के साथ विदा किया। मीरा ने किसी से कुछ नहीं कहा। उसने बस अगले दिन स्कूल जाकर बच्चों को गिनती सिखाई — और उस दिन गिनती ग्यारह पर रुक गई।

तेरहवीं चिट्ठी

चालीसवें दिन डाकिया फिर आया। हाथ में एक लिफाफा — वही टेढ़ी लिखावट, वही नीली स्याही। मीरा के हाथ कांपे। तारीख़ देखी तो सांस अटक गई: चिट्ठी उस दिन के तीन दिन बाद की थी, जिस दिन के बाद कुछ नहीं होना चाहिए था।

डाकिये ने धीरे से समझाया — पहाड़ों की डाक है, रास्ते में महीना भी लग जाता है। चिट्ठी पहले लिखी गई थी, बाद में पहुंची। तारीख़ कबीर की आदत थी: वह हमेशा आगे की तारीख़ डालता था। कहता था, "मैं चिट्ठी आज नहीं, उस दिन के लिए लिखता हूं जिस दिन तुम इसे पढ़ोगी।"

मीरा ने लिफाफा खोला।

"मीरा, अगर यह चिट्ठी देर से पहुंचे, तो नाराज़ मत होना। यहां से सब कुछ देर से पहुंचता है — सिवाय तुम्हारी याद के, वह वक्त से पहले आ जाती है।"

चिट्ठी में आगे लिखा था: "तुमने पूछा था कि लौटकर क्या करूंगा। सुनो — स्कूल के पास वाली खाली दुकान याद है? उसे किराये पर लेंगे। तुम पढ़ाना मत छोड़ना, मैं चाय बनाऊंगा। बोर्ड पर लिखेंगे: 'मीरा की चाय' — नाम तुम्हारा, मेहनत मेरी। और हर उस बच्चे की चाय मुफ्त, जो गिनती में सौ तक सुना दे।"

आख़िर में बस इतना था: "अगर कभी मैं न लौट पाऊं, तो दुकान फिर भी खोलना। मैं वादों में ज़िंदा रहना जानता हूं।"

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'मीरा की चाय'

दुकान छह महीने बाद खुली। गांव वालों ने सोचा था कि मीरा टूट जाएगी, लेकिन उन्होंने उसे कभी इतना सीधा खड़े नहीं देखा था जितना उस दिन, जब उसने अपने हाथों से बोर्ड टांगा।

दुकान में एक अजीब नियम था, जो हर नया ग्राहक पूछता और हर पुराना ग्राहक मुस्कुरा कर टाल देता: काउंटर के पीछे हमेशा दो कप रखे जाते। एक ग्राहक का। दूसरा हमेशा भरा जाता, कभी पिया नहीं जाता।

बरसों बाद, जब मीरा के बाल सफेद हो चले थे, स्कूल की एक नई अध्यापिका ने हिम्मत करके पूछ ही लिया — "दीदी, वह दूसरा कप किसके लिए है?"

मीरा ने खिड़की के बाहर देखा, जहां शाम धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे उतर रही थी।

"उसके लिए, जो चिट्ठियों में आगे की तारीख़ डालता था। वह आज भी आगे की किसी तारीख़ में है — और मैं हर रोज़ उसकी चाय वक्त पर रखती हूं, ताकि जिस दिन वह तारीख़ आए, चाय ठंडी न मिले।"

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