हाशिये का दोस्त
एकतरफ़ा प्यार की एक कहानी — उनके लिए, जिन्होंने कभी किसी को दूर से चाहा है।
रेवा को ज़िला पुस्तकालय की आदत कॉलेज के पहले साल में लगी थी। हर शनिवार, तीसरी अलमारी, उपन्यासों वाला खाना। और उसी पहले साल में उसे वह भी मिला, जिसे वह 'हाशिये का दोस्त' कहती थी।
हुआ यह कि 'गोदान' के पन्ना 211 पर, हाशिये में, किसी ने पेंसिल से लिखा था — "यहां से आगे मत पढ़ना अगर आज उदास हो। कल पढ़ना। कहानी वही रहेगी, तुम नहीं।"
रेवा उस दिन सचमुच उदास थी। उसने किताब बंद की, और अगले दिन पढ़ी। और उस दिन से एक खेल शुरू हो गया — वह जो भी किताब उठाती, हाशियों में उसी पेंसिल की लिखावट मिलती। कहीं एक वाक्य के नीचे लकीर और सिर्फ इतना — "यह दोबारा पढ़ना।" कहीं किसी किरदार के बचाव में पूरी बहस। कहीं मज़ाक — "लेखक साहब ने कभी रोटी नहीं बेली, वरना यह सीन ऐसे न लिखते।"
बारह साल। रेवा की नौकरी लगी, तबादले हुए, वापसी हुई। पर शनिवार और तीसरी अलमारी नहीं छूटी। हाशिये का दोस्त भी नहीं छूटा। रेवा ने कभी पता नहीं लगाया कि वह कौन है। डर से नहीं — दरअसल उसे यह दोस्ती इतनी पसंद थी कि वह इसे चेहरा देकर खोना नहीं चाहती थी।
आख़िरी नोट
फिर एक शनिवार, हाशिये ख़ाली मिले।
उस शनिवार भी। उसके अगले भी। महीना बीत गया। रेवा ने नई आई किताबें छानीं, पुरानी दोबारा पलटीं — पेंसिल की वह गोल, झुकी हुई लिखावट कहीं नहीं थी। उसे ख़ुद पर हैरानी हुई कि एक अनजान आदमी की पेंसिल के लिए उसका दिल इस तरह डूब सकता है।
दो महीने बाद, काउंटर पर बैठने वाले बूढ़े वर्मा जी ने उसे रोका। "रेवा बेटा, तुम्हारे नाम की एक चीज़ रखी है।"
भूरे काग़ज़ में लिपटी एक किताब थी — 'गोदान'। वही पुरानी प्रति, पन्ना 211 पर वही पहला नोट। और किताब के बीच में एक चिट्ठी।
"मैं समर हूं। बारह साल पहले मैं यहां लाइब्रेरी असिस्टेंट था, और तीसरी अलमारी की धूल झाड़ते हुए मैंने एक लड़की को 'गोदान' के आगे रोते देखा था। मुझमें पूछने की हिम्मत नहीं थी। तो मैंने वह किया जो एक किताबों वाला कर सकता है — अगले पन्ने पर पेंसिल से एक बात लिख दी।"
समर की चिट्ठी
चिट्ठी लंबी नहीं थी। पर उसमें बारह साल थे।
"तुमने कभी मुड़कर काउंटर की तरफ़ नहीं देखा, और मैं हर शनिवार यही सोचकर आता रहा कि आज देखोगी। फिर सोचता — मत देखो। जो आदमी हाशिये में रहता है, वह पन्ने के बीच में आकर क्या करेगा? तुम किताबें प्यार से पढ़ती थीं, और मेरे नोट्स भी। मेरे हिस्से का इतना ही बहुत था।"
"अब बीमारी मुझे उस शहर ले जा रही है जहां मेरा बेटा है। जाने से पहले सोचा, बारह साल की दोस्ती को नाम तो बता दूं। तुमसे कुछ मांगना नहीं है, रेवा। बस एक बिनती है — किताबें पढ़ती रहना। और कभी-कभी, किसी उदास पन्ने पर, किसी अनजान के लिए पेंसिल से दो शब्द लिख देना। हाशिये में जगह बहुत होती है, और उदास पढ़ने वाले भी।"
नीचे पता नहीं था। फ़ोन नंबर नहीं था। सिर्फ एक नाम — समर।
तीसरी अलमारी
रेवा अब भी हर शनिवार पुस्तकालय जाती है।
उसने समर को ढूंढने की कोशिश की थी — वर्मा जी को सिर्फ इतना पता था कि वह बरसों पहले नौकरी छोड़कर भी हर शनिवार आता रहा, एक पाठक की तरह। रजिस्टर में उसका पता किसी पुराने मकान का था, जहां अब कोई और रहता है।
तो रेवा ने वही किया जो उससे हो सकता था। अब ज़िला पुस्तकालय की किताबों के हाशियों में एक नई लिखावट दिखती है — गोल नहीं, थोड़ी सीधी। कॉलेज के बच्चे उसके नोट्स की तस्वीरें एक-दूसरे को भेजते हैं। किसी को नहीं पता यह कौन लिखता है।
'गोदान' के पन्ना 211 पर, पुराने नोट के ठीक नीचे, अब एक नई पंक्ति है:
"मैंने अगले दिन पढ़ी थी, समर। दोनों बातें सच निकलीं — कहानी वही रही, मैं नहीं। — तुम्हारी हाशिये की दोस्त"
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