पहली तारीख़
अरेंज मैरिज में प्यार शादी से पहले नहीं होता। बाद में आता है। हमारे घर में वह हर महीने की पहली तारीख़ को आता था — थोड़ा-थोड़ा।
डालडा का डिब्बा
मेरी शादी में दो हफ्ते बचे थे और घर की हर अलमारी उलटी पड़ी थी। सबसे ऊपर वाले खाने से, साड़ियों के पीछे, मुझे वह डिब्बा मिला — डालडा का पुराना टिन, जिसके ढक्कन पर मम्मी की लिखावट में बस इतना लिखा था: "पहली तारीख़।"
अंदर कबाड़ था। या मुझे कबाड़ लगा। लाल रिबन, कांच की चूड़ियां, हेयरक्लिप, बिंदी के अधूरे पत्ते, एक प्लास्टिक का फूल। तीन सौ से ऊपर चीज़ें — और हर चीज़ अख़बार की पर्ची में लिपटी हुई। हर पर्ची पर पापा की लिखावट में महीना और साल: अगस्त 1999। मार्च 2004। जनवरी 2013।
मैंने डिब्बा नीचे लाकर मम्मी के सामने रखा — "मम्मी, ये क्या जमा कर रखा है? दो रुपये वाले रिबन? फेंक दूं?"
मम्मी ने ढक्कन ऐसे वापस लगाया, जैसे मैंने किसी मंदिर का दरवाज़ा खुला छोड़ दिया हो।
अगस्त 1999
शादी उनकी अरेंज्ड थी — एक मुलाकात वाली। "मुलाकात भी क्या," मम्मी ने कहा, "तुम्हारे नाना और तुम्हारे दादाजी बात करते रहे, हम दोनों चाय के कप गिनते रहे। मैंने तुम्हारे पापा की आवाज़ शादी के मंडप में पहली बार ठीक से सुनी।"
पापा तब तहसील के दफ्तर में क्लर्क थे। तनख्वाह अठारह सौ रुपये। उसमें से आधी दादाजी के इलाज में जाती, कुछ छोटे चाचा की पढ़ाई में, और बाकी उस कर्ज़ में, जो शादी ने ही चढ़ाया था।
पहली तनख्वाह वाले दिन — शादी के बाद वाली पहली तारीख़ — पापा शाम को घर लौटे तो मुट्ठी बंद थी। खोली तो उसमें ठेले वाला दो रुपये का लाल रिबन था। बोले — "अभी यही है। जिस दिन कुछ बन जाऊंगा, सोना लाऊंगा।"
मम्मी कहती हैं, उन्होंने उस रात वह रिबन ऐसे बांधा, जैसे लोग मंगलसूत्र पहनते हैं।
अगले महीने की पहली तारीख़ को कांच की चूड़ियां आईं। उससे अगले महीने बिंदी का पत्ता। नियम बन गया, जो कभी बोला नहीं गया: तनख्वाह का पहला खर्च — कुछ छोटा, कुछ बेकार-सा, सिर्फ मम्मी के लिए।
जो महीने मुश्किल थे
मैंने पूछा — "पच्चीस साल में कभी नागा नहीं हुआ?"
मम्मी ने डिब्बे में से एक पर्ची निकाली। नवंबर 2008। उसमें हरे कांच की एक अकेली चूड़ी थी, जिसमें बाल आया हुआ था — टूटी हुई, पर फेंकी नहीं गई।
"यह उस महीने की है, जिस महीने हम बोल नहीं रहे थे। झगड़ा बड़ा था — इतना बड़ा कि मैं चार दिन नानी के घर रह आई थी। पहली तारीख़ को लौटी तो यह चूड़ी दरवाज़े की कुंडी पर बंधी मिली। न चिट्ठी, न माफ़ी। बस चूड़ी। तुम्हारे पापा से 'सॉरी' आज तक नहीं बोला गया, बेटा। पर पहली तारीख़ कभी ख़ाली नहीं गई।"
मैंने पूछा — प्यार कब हुआ फिर? किस साल?
"अरेंज मैरिज में प्यार शादी से पहले नहीं होता। बाद में आता है। किसी घर में चाय से आता है, किसी में झगड़े के बाद वाली चुप्पी से। हमारे घर में पहली तारीख़ से आया — थोड़ा-थोड़ा, हर महीने। पच्चीस साल में पूरा हो गया।"
पेंशन
इसी साल मार्च में पापा रिटायर हो गए। मुझे अजीब सा डर था, जो मैं किसी से कह नहीं पाई — तनख्वाह ख़त्म, तो पहली तारीख़ भी ख़त्म? पेंशन तो महीने की सात तारीख़ को आती है।
पहली अप्रैल को पापा सुबह टहलने निकले। लौटे तो हाथ में वही अख़बार की पुड़िया थी। मम्मी की तरफ बढ़ाई और अपने चश्मे के पीछे से बोले —
"तनख्वाह की तारीख़ बदल गई है। मेरी नहीं।"
उस दिन मैंने अपनी शादी की लिस्ट में से एक चीज़ काट दी — वह सोने वाली मांग, जो हर लिस्ट में होती है। और धीरे से डिब्बे वाली बात अपने होने वाले पति को फ़ोन पर सुना दी। उसने पूछा — "तो मैं क्या लाऊं पहली तारीख़ को?" मैंने कहा — "जो दो रुपये में आए। बाकी पच्चीस साल में सीख जाओगे।"
जाते-जाते मैंने मम्मी को छेड़ा था — "सोना तो पापा आज तक नहीं लाए।"
मम्मी ने डिब्बा वापस साड़ियों के पीछे रखते हुए कहा — "लाया तो था। तीन सौ बार। बस पहचानने में मुझे कुछ महीने लग गए थे।"
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