दो टिकट
चालीस साल की शादी थी उनकी। जोड़ कर देखो तो साथ शायद बारह साल रहे। फिर भी लोग उनसे पूछते थे कि निभाना कैसे सीखें।
रविवार का ग्राहक
मेरी चाय की दुकान रामगंज जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर है। छोटा स्टेशन है — दो प्लेटफॉर्म, चार बेंच, एक टिकट खिड़की और मैं। यहां ट्रेनें कम रुकती हैं और लोग ज़्यादा।
बाबूजी हर रविवार सुबह सवा नौ बजे आते थे। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में काला छाता — धूप हो या न हो — और जेब में दो प्लेटफॉर्म टिकट। बेंच नंबर चार पर बैठते। साढ़े ग्यारह की पैसेंजर आती, दो मिनट रुकती, चली जाती। बाबूजी उठते, मेरी दुकान से एक कुल्हड़ चाय पीते, पैसे शीशे के गल्ले पर रखते, और चले जाते।
दो साल तक यही क्रम। न कोई उतरा, न कोई मिला।
टिकट खिड़की वाले रघु ने एक दिन बताया — "हर बार दो टिकट लेते हैं। मैंने पूछा था, कोई आ रहा है क्या? बोले — हां। मैंने पूछा, कौन? तो हंस दिए।"
पूछना
एक रविवार बारिश ऐसी हुई कि साढ़े ग्यारह वाली डेढ़ घंटा लेट हो गई। प्लेटफॉर्म खाली था। मैंने बिना मांगे दूसरी चाय बढ़ा दी और वह सवाल पूछ लिया, जो दो साल से केतली के साथ उबल रहा था।
"बाबूजी, किसका इंतज़ार करते हैं? बुरा मत मानिएगा... पर कोई आता तो नहीं।"
उन्होंने चाय की तरफ देखा, फिर पटरियों की तरफ। बोले — "आना ज़रूरी नहीं है, बेटा। इंतज़ार ज़रूरी है।"
फिर उन्होंने वह कहानी सुनाई, जो मैं आज तक किसी को चाय देते हुए नहीं भूल पाया।
शादी उन्नीस सौ अस्सी में हुई थी। नौकरी भिलाई के कारखाने में, घर यहां — आठ सौ किलोमीटर दूर। "आजकल के बच्चे इसे लॉन्ग डिस्टेंस कहते हैं," उन्होंने कहा, "हमारे ज़माने में इसे नौकरी कहते थे।"
छुट्टी हर दूसरे महीने मिलती थी। साढ़े ग्यारह की यही गाड़ी। और शारदा — उनकी पत्नी — हर बार प्लेटफॉर्म पर मिलती थी। स्टेशन का नियम था: बिना टिकट अंदर नहीं। तो वह हर बार चार आने का प्लेटफॉर्म टिकट लेती और बेंच नंबर चार पर बैठकर इंतज़ार करती।
"चालीस साल में ऐसा एक बार नहीं हुआ कि मैं उतरूं और वह वहां न हो। एक बार एक सौ तीन बुखार में आई थी। मैंने डांटा तो बोली — टिकट ले लिया था, बर्बाद थोड़े करती।"
चालीस साल, बारह साल
चिट्ठियां महीने में दो आती थीं। "उसने चालीस साल में कभी 'जल्दी आओ' नहीं लिखा," बाबूजी ने कहा। "लिखती थी — साढ़े ग्यारह वाली से आना। मैं वहीं मिलूंगी। बस। जल्दी आओ में शिकायत होती है, बेटा। वहीं मिलूंगी में भरोसा होता है।"
मैंने पूछा — इतनी दूरी में शादी निभी कैसे?
"दूरी नौकरी में थी। शादी में नहीं थी।"
दो साल पहले शारदा जी चली गईं। उनके संदूक से एक पुराना डिब्बा निकला — पान-मसाले का, ज़ंग लगा। उसमें प्लेटफॉर्म टिकट थे। सारे के सारे। चालीस साल के, तीन सौ से ऊपर। चार आने वाले भी, दो रुपये वाले भी, दस रुपये वाले भी। उसने एक भी नहीं फेंका था।
"तो अब हर रविवार मैं दो टिकट लेता हूं। एक मेरा, एक उसका। साढ़े ग्यारह की गाड़ी देखता हूं और घर चला जाता हूं। चालीस साल उसने मेरा इंतज़ार किया, बेटा। अब बारी मेरी है। इंतज़ार उधार नहीं रखा जाता।"
आख़िरी रविवार
फिर एक रविवार वे नहीं आए। मैंने सोचा, बारिश होगी। अगले रविवार भी नहीं। तीसरे हफ्ते एक लड़का आया — उनका पोता। बेंच नंबर चार के पास खड़ा होकर बोला — "दादाजी नहीं रहे। नींद में गए। आप ही चाय वाले भैया हैं न? वे घर में आपका ज़िक्र करते थे — कहते थे, स्टेशन पर एक है जो बिना पूछे दूसरी चाय दे देता है।"
जाते-जाते उसने पूछा — "वे यहां हर रविवार करते क्या थे?"
मैंने उसे बेंच दिखाई। टिकट खिड़की दिखाई। साढ़े ग्यारह की गाड़ी का वक्त बताया। वह देर तक बेंच पर बैठा रहा। फिर उसने रघु से दो प्लेटफॉर्म टिकट खरीदे — "एक मेरा। एक दादाजी का।" — और गाड़ी आने तक बैठा रहा।
अब हर रविवार साढ़े ग्यारह बजे मैं दो कुल्हड़ चाय बेंच नंबर चार पर रख देता हूं। कोई पीता नहीं। भाप उठती है, गाड़ी आती है, रुकती है, चली जाती है।
हिसाब की कॉपी में मैं उन दो चायों को नाम से लिखता हूं — "दो टिकट।"
दुकान में कुछ चीज़ें मुफ्त भी होती हैं। इंतज़ार उनमें सबसे महंगा है।
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