दूध खत्म है
शादी के बाद की एक प्यारी सी प्रेम कहानी — उन जोड़ों के लिए जिनका प्यार शादी के बाद शुरू हुआ।
शादी को तीन महीने हुए थे, और आरव-नंदिनी की कुल बातचीत का हिसाब कोई रखता, तो शायद दो पन्ने भी न भरते।
अरेंज्ड मैरिज थी। लड़का देखने वाले दिन दोनों ने एक-दूसरे से कुल चार वाक़्य कहे थे, जिनमें से दो 'जी' और 'जी, ठीक है' थे। फिर शादी की भागदौड़, रिश्तेदारों का शोर, और उसके बाद वह चीज़ जिसने बची-खुची बातचीत भी खा ली — शिफ्टें।
नंदिनी बैंक में थी — सुबह नौ से शाम छह। आरव अस्पताल की लैब में — रात आठ से सुबह पांच। वह लौटता तो वह निकल चुकी होती। वह लौटती तो वह सो रहा होता। दो लोग, एक घर, और बीच में सिर्फ एक चीज़ साझा थी — फ्रिज।
उसी फ्रिज पर नंदिनी की मां ने गृहप्रवेश के दिन एक छोटा व्हाइटबोर्ड चिपका दिया था — "काम की चीज़ें लिखने के लिए।"
पहला मैसेज आरव ने लिखा था, चौथे हफ़्ते:
"दूध खत्म है।"
बोर्ड भरने लगा
जवाब अगली सुबह मिला — "ले आई हूं। अंडे भी। आप नाश्ता नहीं करते क्या?"
आरव ने शाम को लिखा — "रात का खाना ही मेरा नाश्ता है। वैसे दाल अच्छी थी।"
"वह दाल मैंने नहीं, पड़ोस वाली आंटी ने भेजी थी," अगली सुबह बोर्ड पर लिखा था। और नीचे, छोटे अक्षरों में — "पर कल की भिंडी मैंने बनाई थी। उसका रिव्यू?"
यहीं से बात बदलनी शुरू हुई। 'दूध खत्म है' की जगह धीरे-धीरे लंबी बातें आने लगीं। आरव रात की शिफ्ट से लौटकर सबसे पहले फ्रिज देखता — भूख से नहीं। नंदिनी सुबह बैंक निकलने से पहले पांच मिनट पहले उठने लगी, ताकि जवाब लिखने का वक़्त मिल जाए।
बोर्ड पर अब सब कुछ आता था। आरव के मरीज़ों के क़िस्से — "आज लैब में एक अंकल बोले, रिपोर्ट अच्छी आए तो मिठाई खिलाऊंगा। रिपोर्ट ख़राब आई। मिठाई मैंने खिलाई।" नंदिनी के बैंक के क़िस्से — "आज एक दादी अपनी पासबुक में अपने पोते की फोटो रखवाने आई थीं। मना नहीं कर पाई।"
एक रात आरव ने बोर्ड के कोने में छोटा सा सूरज बनाया, क्योंकि नंदिनी ने लिखा था कि बारिश की वजह से हफ़्ते भर धूप नहीं देखी। नंदिनी ने अगले दिन उस सूरज के नीचे छाता बना दिया। दोनों में से किसी ने इस पर कभी कुछ नहीं कहा। कुछ बातें बोर्ड पर भी नहीं लिखी जातीं।
साफ़ बोर्ड
छठे महीने गांव से आरव की बुआ आईं — हफ़्ते भर के लिए।
बुआ सफ़ाई-पसंद थीं। तीसरे दिन नंदिनी बैंक से लौटी, तो रसोई चमक रही थी, फ्रिज चमक रहा था, और व्हाइटबोर्ड… साफ़। बिल्कुल साफ़। पांच महीनों की बातें, क़िस्से, सूरज और छाता — एक गीले कपड़े में समा गए थे।
बुआ ने आराम से बताया — "इतना गंदा बोर्ड था, सब मिटा दिया। लिखने की जगह ही नहीं बची थी।"
नंदिनी को समझ नहीं आया कि गला क्यों भर आया। यह भी समझ नहीं आया कि रात के दो बजे, जब आरव लौटा, वह जगी हुई क्यों थी। वह रसोई में गई, तो आरव ख़ाली बोर्ड के सामने वैसे खड़ा था, जैसे किसी ने घर का सामान चोरी कर लिया हो।
पांच महीनों में पहली बार, दोनों एक-दूसरे के सामने थे और जागे हुए थे।
"बोर्ड पर लिखने की जगह नहीं बची थी," आरव ने धीरे से कहा। "बुआ ठीक कहती हैं। अब बाकी बातें ऐसे ही करनी पड़ेंगी।"
उस रात दो बजे चाय बनी। बातें सुबह चार बजे तक चलीं। आरव ने पहली बार जाना कि नंदिनी को उसकी लिखावट पढ़ने में शुरू के दो हफ़्ते डिक्शनरी जैसी मेहनत लगी थी। नंदिनी ने पहली बार जाना कि वह सूरज आरव ने तीन बार मिटाकर बनाया था — "पहले दो बार आलू जैसा बन रहा था।"
नया बोर्ड
बुआ के जाने के बाद बोर्ड वापस अपनी जगह लग गया। पर अब उसका काम बदल गया था — अब उस पर सचमुच सिर्फ़ काम की चीज़ें लिखी जाती थीं। दूध, अंडे, बिजली का बिल।
बाक़ी बातों के लिए अब वक़्त निकाला जाता था। आरव ने अपनी शिफ्ट बदलवा ली थी — महीने में पंद्रह दिन ही रात की ड्यूटी। नंदिनी ने शनिवार की छुट्टी लेना सीख लिया था।
बस हर शादी की सालगिरह पर एक रिवाज़ ज़रूर निभाया जाता है। उस दिन बोर्ड साफ़ किया जाता है, और आरव उस पर वही पहला वाक़्य लिखता है —
"दूध खत्म है।" और नीचे नंदिनी लिखती है — "पर हम नहीं।"
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