मेहंदी का नाम
एक लिखी हुई रोमांटिक कहानी — पढ़ने के लिए भी, और उसे भेजने के लिए भी, जिसका नाम आप अपनी हथेली पर लिखवाना चाहें।
रिवाज़ पुराना है — मेहंदी वाली रात दुल्हन की हथेलियों में कहीं दूल्हे का नाम छिपा दिया जाता है। और शादी की रात दूल्हे को वह नाम ढूंढना पड़ता है। न मिले, तो देवरानियां-जेठानियां हंसती हैं, और दूल्हा जुर्माना भरता है।
आरव ने पूरे पैंतालीस मिनट लगाए। रूही की दोनों हथेलियां, कलाइयों तक फैली बेलें, मोर, बारीक जालियां — सब छान मारीं। 'आरव' कहीं नहीं था। आख़िर में हारकर बोला — "जुर्माना बता दीजिए। नाम तो है ही नहीं।"
कमरे में उस वक्त सिर्फ रूही थी। अरेंज्ड मैरिज थी — तीन मुलाक़ातें, दो फ़ोन कॉल, एक हां। रूही ने अपनी बायीं हथेली खोली और छोटी उंगली के नीचे की तरफ़ इशारा किया। वहां, पत्तियों के बीच, बहुत बारीक — एक सवालिया निशान बना था।
"मेहंदी वाली दीदी बहुत हैरान हुई थीं," रूही ने कहा। "कहने लगीं, बीस साल में किसी दुल्हन ने नाम की जगह सवाल नहीं लिखवाया।"
आरव ने पूछा — "मतलब?"
"मतलब यह," रूही ने कहा, "कि नाम मुझे अभी आता नहीं। तीन मुलाक़ातों में नाम नहीं आता, सिर्फ पता चलता है। नाम कमाना पड़ता है। जिस दिन आ जाएगा, लिखवा दूंगी। पूरा नहीं — एक-एक अक्षर। जितना कमाओगे, उतना।"
आरव को उसी रात समझ आ गया था कि उसकी शादी किसी और की तरह नहीं चलने वाली।
पहला अक्षर
पहली सालगिरह पर रूही ब्यूटी पार्लर से लौटी तो बायीं हथेली पर ताज़ी मेहंदी थी। वही बेलें, वही मोर। और छोटी उंगली के नीचे, सवालिया निशान की जगह — 'आ'।
आरव ने पूछा — किस बात का?
"फरवरी याद है?" रूही ने कहा। "जब मां के जाने के बाद मैं दो हफ्ते ठीक से बोली नहीं थी? तुमने एक बार भी 'मूव ऑन' नहीं कहा। बस रोज़ शाम को वैसी चाय बनाते रहे, जैसी मां बनाती थीं। इलायची कूटकर। तुमने कभी बताया नहीं कि तुमने मौसी से बनाना सीखा था।"
आरव ने बताया भी नहीं था कि सीखने में उसे ग्यारह कोशिशें लगी थीं। पर 'आ' के लिए इतना काफ़ी था।
दूसरा अक्षर
दूसरा साल बुरा था।
आरव की कंपनी में छंटनी हुई और नाम उसका भी था। चार महीने घर बैठा। इंटरव्यू, इनकार, फिर इंटरव्यू। ऐसे वक्त में आदमी सबसे पहले जो चीज़ छोड़ता है, वह है सच बोलना — "सब ठीक है" कहना आसान होता है।
पर आरव ने एक अजीब चीज़ की। हर शाम, खाने की मेज़ पर, वह रूही को पूरा हिसाब देता — "आज दो जगह मेल किया। एक ने मना कर दिया। दोपहर में डर लग रहा था, तो आधे घंटे छत पर टहल आया।" बिना सजाए, बिना छिपाए। डर तक बताता था। मर्द डर नहीं बताते — आरव बताता था।
सालगिरह आई तो घर में पार्लर के पैसे नहीं थे। रूही ने बाज़ार से बीस रुपये की मेहंदी की कोन लाकर खुद ही टेढ़ा-मेढ़ा मोर बनाया। और उसके नीचे — 'र'।
"इस साल तो मैंने कुछ कमाया ही नहीं," आरव ने धीरे से कहा।
"जिस साल तुम गिरे और मुझसे छिपाया नहीं," रूही ने उसकी तरफ़ देखे बिना कहा, "उस साल तुमने सबसे ज़्यादा कमाया।"
आख़िरी अक्षर
तीसरी सालगिरह वाले हफ्ते रूही अस्पताल में थी। अपेंडिक्स — ऑपरेशन अच्छा हुआ था, पर सालगिरह की रात उसे वहीं गुज़ारनी थी। हरे पर्दे, दवा की गंध, हाथ में कैनुला। मेहंदी का सवाल ही नहीं था।
आरव शाम को आया तो उसकी अपनी बायीं हथेली पर कुछ था। रूही ने पास बुलाकर देखा — बेहद टेढ़ी, कहीं मोटी, कहीं फैली हुई मेहंदी। जो शायद मोर था, वह बत्तख लग रहा था। यूट्यूब से सीखी गई, ज़िंदगी की पहली मेहंदी।
और बीचोबीच, साफ अक्षरों में — 'रूही'। पूरा नाम।
"यह क्या है?" रूही ने पूछा।
"तुम्हारा नाम," आरव ने कहा। "तुमने कहा था नाम कमाना पड़ता है। तुम्हारा नाम तो मैंने पहले ही दिन कमा लिया था — जब तुमने मेहंदी में सवाल लिखवाकर मुझे तीन साल का होमवर्क दे दिया। बस लिखना अब सीखा है।"
रूही हंसी — टांकों की वजह से धीरे-धीरे, संभलकर। फिर बोली — "कोन लाए हो?"
आरव ने जेब से कोन निकाली। रूही ने उसकी हथेली अपनी गोद में रखी, कैनुला वाले हाथ से ही, कांपती लकीरों में अपने बत्तख-जैसे मोर के नीचे आख़िरी अक्षर बनाया — 'व'।
तीन साल में पूरा हुआ — आ, र, व।
दसवीं सालगिरह
अब उनके घर एक रिवाज़ है, जो किसी और घर में नहीं। हर सालगिरह पर मेहंदी दोनों लगाते हैं — रूही की हथेली पर 'आरव', आरव की हथेली पर 'रूही'। आरव की मेहंदी आज भी वैसी ही टेढ़ी है। रूही कहती है, यही उसका सबसे अच्छा हिस्सा है।
पिछली सालगिरह पर किसी मेहमान ने पूछा — यह उल्टा रिवाज़ कहां से आया? दूल्हे कब से मेहंदी लगाने लगे?
रूही ने अपनी हथेली दिखाई और बस इतना कहा —
"इस घर में नाम लिखे नहीं जाते। कमाए जाते हैं।"
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