आवाज़
एक इमोशनल लव स्टोरी — उस आदमी की, जो सब कुछ खोने को तैयार था, बस एक आवाज़ छोड़कर।
डॉक्टर ने रिपोर्ट मेज़ पर रखी और वही कहा, जो समीर तीन महीने से अनसुना करने की कोशिश कर रहा था — "धीरे-धीरे जाएगी। साल, डेढ़ साल। पूरी नहीं जाएगी, पर जो बचेगी, वह बहुत कम होगी। मशीन से थोड़ी मदद मिलेगी, पूरी नहीं।"
समीर देर तक चुप बैठा रहा। फिर उसने वह सवाल पूछा, जिस पर डॉक्टर साहब बीस साल की प्रैक्टिस में पहली बार अटके।
"डॉक्टर साहब, ऐसा नहीं हो सकता कि बाकी सब चला जाए... बस एक आवाज़ बची रहे? सिर्फ एक। मैं ट्रैफिक नहीं सुनना चाहता, टीवी नहीं, अपना नाम भी नहीं। बस मेरी पत्नी जिस तरह 'सुनिए' कहती है — वह बचा लीजिए।"
डॉक्टर ने धीरे से समझाया कि कान ऐसे सौदे नहीं करते। वे या तो सुनते हैं, या नहीं सुनते। वे यह नहीं पूछते कि आवाज़ किसकी है।
उस दिन घर लौटते हुए समीर ने ऑटो नहीं लिया। पैदल चला। रास्ते भर शहर को सुनता रहा — रिक्शे की घंटी, चाय की केतली, मंदिर की आरती। जैसे कोई जाने से पहले घर का सामान गिन रहा हो।
चोरी
समीर ने नूपुर को कुछ नहीं बताया। बताता तो वह रोती नहीं — नूपुर रोने वालों में से नहीं थी — वह लड़ने लगती। डॉक्टर बदलती, शहर बदलती, भगवान बदल देती। और समीर के पास लड़ाई के लिए वक्त नहीं था। उसके पास सुनने के लिए एक ही साल था।
तो उसने चोरी शुरू की।
रसोई से आती आवाज़ — "खाना लग गया है, आ जाइए" — फ़ोन में रिकॉर्ड। सब्ज़ी वाले से भाव-तोल करती नूपुर — रिकॉर्ड। बालकनी में अपनी मां से फ़ोन पर घंटे भर की बातें, जिनमें आधा वक्त वह हंसती ही रहती थी — रिकॉर्ड। यहां तक कि वह डांट भी — "गीला तौलिया बिस्तर पर फिर से?" — वह भी रिकॉर्ड।
फ़ोन में एक फ़ोल्डर बनता गया। नाम था — "नूपुर — बचाकर रखने वाली आवाज़ें।" तीन सौ सत्रह क्लिप।
अब वह अख़बार खुद नहीं पढ़ता था। नूपुर से कहता — "तुम पढ़कर सुनाओ, तुम्हारे पढ़ने में ख़बरें कम बुरी लगती हैं।" नूपुर हैरान होती, पर सुनाती। समीर आंखें बंद करके सुनता, जैसे कोई प्यासा पानी नहीं पी रहा हो — जमा कर रहा हो।
फ़ोल्डर
चोर आठ महीने में पकड़ा गया।
नूपुर को गाना डाउनलोड करना था और समीर का फ़ोन हाथ में था। फ़ोल्डर सामने आ गया। नाम पढ़ा। तीन सौ सत्रह क्लिप देखीं। पहली क्लिप चलाई — उसकी अपनी आवाज़ थी, दाल में तड़का लगाते हुए कुछ गुनगुनाती हुई।
शाम को समीर लौटा तो नूपुर मेज़ पर बैठी थी। सामने फ़ोन रखा था। आंखें लाल थीं, पर आवाज़ सीधी।
"कब से जानते हो?"
समीर ने बैग नहीं उतारा। दरवाज़े पर ही खड़ा रहा — "ग्यारह महीने।"
"और मुझे बताने की जगह तुमने मुझे... रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया? समीर, मैं तुम्हारी पत्नी हूं। इलाज साथ में ढूंढा जाता है। यह क्या ढूंढ रहे थे तुम अकेले?"
समीर ने बहुत धीरे से कहा — "इलाज नहीं था, नूपुर। मैं बस... जो सबसे ज़्यादा खोने से डरता था, उसे बचा रहा था। बाकी सब जाए तो जाए। शहर की आवाज़ मुझे याद नहीं रखनी। तुम्हारी रखनी है।"
नूपुर उस रात लड़ी नहीं। रोई भी नहीं। बस देर रात तक फ़ोल्डर की क्लिपें सुनती रही — अपनी ही आवाज़, अपने ही घर की, एक ऐसे आदमी के फ़ोन में, जो उन्हें ऐसे संभाल रहा था जैसे लोग गहने संभालते हैं।
योग की क्लास
उसके बाद नूपुर हर मंगलवार और शुक्रवार शाम को 'योग क्लास' जाने लगी। समीर को ताज्जुब हुआ — नूपुर और योग? पर उसने टोका नहीं। जिस घर में एक राज़ ग्यारह महीने रह चुका हो, वहां दूसरे राज़ के लिए भी जगह बन जाती है।
सुनना धीरे-धीरे जाता रहा। पहले दरवाज़े की घंटी गई। फिर कुकर की सीटी। समीर मशीन लगाता, तो आवाज़ें आतीं ज़रूर, पर ऐसे जैसे कोई दीवार के पार से बोल रहा हो। और एक सुबह वह आई, जिसका डर था — नूपुर ने पीछे से आकर कुछ कहा, और समीर को पता ही नहीं चला कि कमरे में कोई है।
वह सिंक के सामने खड़ा रहा, हाथ में झूठा कप, और पहली बार उसकी हिम्मत टूटी।
नूपुर उसके सामने आई। उसने पर्स से एक पुराना काग़ज़ निकाला — किसी संस्था की रसीद। मंगलवार-शुक्रवार, शाम छह से आठ। कोर्स का नाम — भारतीय सांकेतिक भाषा। बैच 2025।
योग की क्लास, जो योग की क्लास कभी थी ही नहीं।
और फिर नूपुर ने हाथ उठाए — थोड़े कच्चे, थोड़े कांपते — और हवा में पहला पूरा वाक्य बुना, जो उसने एक साल तक सिर्फ इसी दिन के लिए सीखा था:
"सुनना कानों से नहीं होता।"
तीन सौ अठारह
अब उस घर में सबसे ज़्यादा बातें हाथों से होती हैं। लड़ाइयां भी — नूपुर का कहना है कि इशारों में डांटना ज़्यादा मुश्किल है, क्योंकि सामने वाला आंखें बंद कर ले तो डांट बेकार। समीर अक्सर आंखें बंद कर लेता है। फिर हंसता है। फिर माफ़ी मांगता है — हाथों से।
फ़ोन वाला फ़ोल्डर आज भी है। समीर कभी-कभी रात में क्लिपें चलाता है — मशीन के सहारे, धीमी, दीवार-पार वाली आवाज़ में ही सही। पर अब फ़ोल्डर में तीन सौ अठारह क्लिपें हैं।
आख़िरी क्लिप में आवाज़ नहीं है। वीडियो है। उसमें नूपुर के हाथ हैं, जो धीरे-धीरे कह रहे हैं — "अब मैं तुम्हें हमेशा सुनाई दूंगी।"
समीर कहता है, उसने नूपुर की आवाज़ कभी खोई ही नहीं। बस उसका रास्ता बदल गया — कान से आंख तक का।
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