हिंदी कहानी · दुखद प्रेम

आख़िरी रिचार्ज

एक रुला देने वाली प्रेम कहानी — उन लोगों के लिए जो जानते हैं कि कुछ नंबर कभी डिलीट नहीं होते।

मोहल्ले की रिचार्ज दुकान वाला छोटू हर महीने की सात तारीख़ को नरेन बाबू का इंतज़ार करता था। पचहत्तर साल के नरेन बाबू छड़ी टेकते हुए आते, जेब से मुड़ा हुआ सौ का नोट निकालते, और हमेशा एक ही बात कहते —

"बेटा, सुधा वाले नंबर में डलवा दो।"

छोटू ने कभी नहीं पूछा कि सुधा कौन हैं। पूछने की ज़रूरत भी नहीं थी। पूरा मोहल्ला जानता था कि सुधा चाची को गुज़रे तीन साल हो चुके थे।

पर नंबर ज़िंदा था। हर महीने, सौ रुपये का रिचार्ज। न कोई कॉल आती उस नंबर पर, न कोई मैसेज। सिम एक पुराने फ़ोन में पड़ा रहता, जो नरेन बाबू के पूजाघर की अलमारी में, सुधा चाची की तस्वीर के ठीक पीछे चार्ज होता रहता था।

वह गाना

बात दरअसल एक गाने की थी।

शादी के चालीसवें साल में, जब बेटे ने ज़िद करके दोनों को स्मार्टफ़ोन दिलाए, सुधा ने सबसे पहले एक ही काम सीखा — कॉलर ट्यून लगाना। और लगाया वही गाना, जो चालीस साल पहले उनकी शादी की रात रेडियो पर बज रहा था। नरेन बाबू चिढ़ते — "पूरा गाना सुनना पड़ता है, तुम फ़ोन ही देर से उठाती हो।"

सुधा हंसतीं — "जान-बूझकर देर से उठाती हूं। कोई तो है जो मेरी वजह से पूरा गाना सुनता है।"

तीन साल पहले, जब अस्पताल से लौटते हुए घर ख़ाली हो गया, नरेन बाबू ने हफ़्ते भर किसी से बात नहीं की। आठवें दिन बेटे ने देखा — पिताजी बालकनी में बैठे हैं, कान से फ़ोन लगाए, आंखें बंद। उसने घबराकर पूछा, किससे बात हो रही है?

"बात नहीं हो रही," नरेन बाबू ने धीरे से कहा। "गाना सुन रहा हूं। तुम्हारी मां आजकल फ़ोन ही नहीं उठाती।"

उस दिन से यह रोज़ का नियम बन गया। हर शाम ठीक छह बजे — उसी वक़्त, जब सुधा तुलसी में दिया रखकर वापस आती थीं — नरेन बाबू उनका नंबर मिलाते, पूरी कॉलर ट्यून सुनते, और फ़ोन रख देते। और हर महीने की सात तारीख़ को रिचार्ज, ताकि नंबर कंपनी वापस न ले ले।

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सात तारीख़

फिर एक महीने, सात तारीख़ को नरेन बाबू नहीं आए।

छोटू ने सोचा तबीयत ढीली होगी। आठ को भी नहीं आए। नौ को मोहल्ले में ख़बर फैली — नरेन बाबू रात में नींद में ही चले गए। चेहरे पर वही सुकून था, जो पूरा गाना सुन लेने के बाद होता है।

तेरहवीं के बाद बेटा दुकान पर आया। थका हुआ, आंखें सूजी हुईं। उसने जेब से मुड़ा हुआ सौ का नोट निकाला — बिल्कुल वैसे ही मोड़ा हुआ, जैसे पिताजी मोड़ते थे।

"मां वाले नंबर में डलवा दो," उसने कहा। फिर रुका, और जोड़ा — "और भैया… पापा वाले नंबर में भी।"

छोटू ने बिना कुछ कहे रिचार्ज कर दिया। उस शाम उसने पहली बार ख़ुद वह नंबर मिलाकर देखा। कॉलर ट्यून अब भी वही थी — चालीस साल पुराना गाना।

पर अब उसे सुनने वाला भी वहीं पहुंच गया था, जहां लगाने वाली थी। शायद वहां किसी रिचार्ज की ज़रूरत नहीं पड़ती।

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