हिंदी कहानी · सच्चा प्रेम

दादी की किताब

कुछ प्रेम कहानियां इतनी सच्ची लगती हैं कि यक़ीन करना पड़ता है — ऐसा किसी न किसी घर में ज़रूर हुआ होगा।

बासठ साल की उम्र में दादाजी ने एक अजीब ज़िद पकड़ी — वह रात की पाठशाला जाएंगे।

घर में हंसी का दौर पड़ गया। पोते ने पूछा, "दादाजी, अब पढ़-लिखकर क्या नौकरी करोगे?" बहू ने समझाया कि आंखें कमज़ोर हैं, घुटने जवाब दे रहे हैं। पर दादाजी हर मंगलवार और शुक्रवार, झोले में एक कॉपी और घिसी हुई पेंसिल डालकर, सरकारी स्कूल की उस क्लास में जा बैठते, जहां उनके अलावा सब रिक्शेवाले और सब्ज़ीवाली मौसियां थीं।

किसी को समझ नहीं आया कि यह सनक है क्या। सिवाय एक इंसान के।

दादी कुछ नहीं बोलीं। बस हर मंगलवार और शुक्रवार, दादाजी के लौटने से पहले, उनकी थाली के पास पानी का गिलास और गुड़ की डली रख देतीं। जैसे स्कूल से लौटे बच्चे के लिए रखी जाती है।

मोतियाबिंद

राज़ दरअसल छह महीने पुराना था।

दादी को किताबों का शौक़ जवानी से था। गांव में जिसके घर भी कोई पुरानी पत्रिका, कोई फटा उपन्यास मिलता, वह दादी तक पहुंच जाता। शादी के बाद भी यह शौक़ नहीं छूटा — रसोई निपटाकर, रात में लालटेन की रोशनी में एक-दो पन्ने। यह उनका अपना कोना था, अपनी दुनिया।

फिर मोतियाबिंद ने वह दुनिया धुंधली कर दी। ऑपरेशन हुआ, पर उम्र के साथ आंखें अब बारीक अक्षरों के आगे हार जाती थीं। एक शाम दादाजी ने देखा — दादी बरामदे में बैठी हैं, गोद में खुली किताब है, और आंखें आंगन के उस पार कहीं ख़ाली देख रही हैं।

"क्या हुआ?" दादाजी ने पूछा था। दादी ने किताब बंद करके मुस्कुरा दिया — "कुछ नहीं। अब कहानियां याद से पढ़ लेती हूं। जो याद नहीं, वो छूट जाती हैं।"

दादाजी उस रात सो नहीं पाए। और अगले मंगलवार से रात की पाठशाला शुरू हो गई।

बात यह थी, जो घर में कोई नहीं जानता था — दादाजी ने ज़िंदगी में कभी पढ़ना सीखा ही नहीं था। हिसाब-किताब ज़ुबानी रखते थे, दस्तख़त की जगह अंगूठा नहीं, बल्कि बरसों की मश्क़ से बनाए तीन टेढ़े अक्षर चलते थे। चालीस साल की गृहस्थी में उन्होंने यह बात इतनी सफ़ाई से छिपाई थी कि ख़ुद को भी कभी-कभी यक़ीन आ जाता था।

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पहली किताब

आठ महीने लगे। बासठ साल पुरानी उंगलियां पेंसिल के आगे कांपती थीं, और मात्राएं किसी शरारती बच्चे की तरह जगह बदल देती थीं। पर दादाजी लगे रहे। क्लास की सब्ज़ीवाली मौसी उनसे दस साल छोटी थीं, पर उन्हें 'मास्टरजी की सबसे मेहनती सवारी' कहती थीं।

फिर एक रात, जब घर सो गया, दादाजी दादी के पास आए। हाथ में वही किताब थी, जो महीनों से बरामदे में बंद पड़ी थी। वह चौकी पर बैठे, चश्मा ठीक किया, और अटकते हुए, एक-एक शब्द जोड़कर, पहला वाक़्य पढ़ा।

दादी ने कुछ नहीं कहा। बस आंचल से आंखें पोंछीं और तकिए से टेक लगाकर आंखें बंद कर लीं — जैसे रेडियो पर अपना पसंदीदा गाना आ गया हो।

उस रात से यह रोज़ का नियम हो गया। रोज़ रात, दो पन्ने। धीरे-धीरे, अटकते हुए, पर रुके बिना।

चालीस साल पुराना राज़

महीनों बाद, एक रात दादी ने संदूक से एक पुराना, पीला पड़ चुका काग़ज़ निकाला। शादी के दूसरे साल का ख़त, जब दादाजी कमाने शहर गए थे। सुंदर, मोतियों जैसे अक्षर।

"यह ख़त तुमने भेजा था," दादी ने कहा। "पर लिखा किसी और ने था। मुंशी के अक्षर थे — मैं पहले ही ख़त में पहचान गई थी। मुंशी लिखाई के पैसे लेता था, और तुम उस महीने अपना दोपहर का खाना छोड़कर उसे पैसे देते थे। पड़ोस के रामदीन ने बताया था।"

दादाजी का चेहरा उतर गया। चालीस साल की मेहनत से छिपाया राज़, और वह पहले ही दिन से खुला हुआ था?

"तो तुमने कभी कहा क्यों नहीं?" उन्होंने पूछा। दादी ने किताब उनकी तरफ़ खिसका दी — "जो आदमी मुझे ख़त भेजने के लिए भूखा रह सकता है, उसे पढ़ना आता है या नहीं, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? मैंने अक्षरों से थोड़े ही प्रेम किया था।"

दादाजी बहुत देर चुप रहे। फिर चश्मा उतारा, पोंछा, वापस लगाया, और पन्ना पलटकर बोले — "आज तीन पन्ने पढ़ूंगा। चालीस साल का हिसाब बराबर करना है।"

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