हिंदी कहानी · मीठा रोमांस

बारिश और चाय

एक छोटी सी रोमांटिक कहानी — सात मिनट की, एक कप चाय जितनी।

आदित्य के ठेले की चाय पूरे मोहल्ले में मशहूर थी, लेकिन खुद आदित्य सिर्फ एक ग्राहक के लिए जाना जाता था — साढ़े पांच वाली मैडम।

वह हर शाम ठीक साढ़े पांच बजे आती। नीला दुपट्टा, कंधे पर भारी बैग, और आंखों में दिन भर की थकान। एक कप कड़क चाय, कम चीनी। पैसे हमेशा खुले। बात कभी नहीं।

आदित्य ने कभी नाम नहीं पूछा। बस इतना किया कि साढ़े पांच बजने से पांच मिनट पहले अदरक कूटना शुरू कर देता, ताकि उसकी चाय ताज़ी बने। कुछ मोहब्बतें इतनी ही होती हैं — अदरक कूटने के वक्त जितनी। पर होती ज़रूर हैं।

एक छाता, दो लोग

जुलाई की वह शाम आसमान फटने पर आमादा थी। बारिश ऐसी कि सड़क और नाली में फर्क मिट गया। ठेले के ऊपर तिरपाल था, पर ग्राहक कोई नहीं। आदित्य ने सोचा, आज वह नहीं आएगी।

वह आई। भीगी हुई, हांफती हुई, और पहली बार — मुस्कुराती हुई।

"आपने ठेला बंद नहीं किया?" उसने पूछा। पहला वाक्य, सात महीनों में।

"साढ़े पांच नहीं बजे थे अभी," आदित्य ने कहा, और फिर खुद ही झेंप गया — यह मानने जैसा था कि वह घड़ी देखकर नहीं, उसे देखकर ठेला चलाता है।

उस दिन चाय के दो कप बने। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी, और ठेले के नीचे की सूखी ज़मीन दो लोगों जितनी ही थी। उसका नाम सांझ था — "मां को शाम पसंद थी," उसने बताया — और वह पास के अस्पताल में नर्स थी। साढ़े पांच उसकी शिफ्ट खत्म होने का वक्त नहीं था; शिफ्ट छह बजे खत्म होती थी। साढ़े पांच वह आधा घंटा था जो वह रोज़ चुराती थी — "दिन की पहली चीज़ जो सिर्फ मेरी हो।"

"तो फिर आज तक चाय के पैसे किस बात के दिए? वह आधा घंटा तो हमेशा से मुफ्त था," आदित्य ने कहा। और बारिश ने बाकी बात ढक ली।
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अगले मानसून तक

उसके बाद सांझ रोज़ आती रही, पर अब चाय ठेले के इस तरफ बनती थी — वह अदरक कूटती, आदित्य पानी चढ़ाता, और मोहल्ले वाले मुस्कुरा कर आंखें फेर लेते।

अगले साल जुलाई की पहली बारिश के दिन ठेले पर एक नया बोर्ड टंगा था। उस पर लिखा था — "सांझ की चाय: शाम साढ़े पांच से। बारिश के दिन छाता लाने की ज़रूरत नहीं।"

नीचे छोटे अक्षरों में एक लाइन और थी, जो सिर्फ वही समझ सकते थे जो पूरी कहानी जानते थे:

"यहां आधा घंटा मुफ्त मिलता है।"

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